Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 8, Verses 37–38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 8, verses 37–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 8 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
अथ नेष्यसि चेद्ब्रह्मंस्तद्धतोऽस्म्यहमेव ते ।
अन्यथा तु न पश्यामि शाश्वतं जयमात्मनः ॥ ३७ ॥
इत्युक्त्वा मृदु वचनं रघूद्वहोऽसौ कल्लोले मुनिमतसंशये निमग्नः ।
नाज्ञासीत्क्षणमपि निश्चयं महात्मा प्रोद्वीचाविव जलधौ स मुह्यमानः ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा यदि यम के सदृश सुन्द और उपसुन्द के पुत्र (मारीच ओर सुबाहु) आपके यज्ञ के
विघ्वंसक हैं, तो भी मैं अपने पुत्र को आपके साथ नहीं भेजूँगा ॥ ३ ६॥
तुम्हारे न देने पर भी तपोबल से श्रीराम को अवश्य ही ले जाऊँगा, ऐसा यदि विश्वामित्र कहें, तो
इस पर कहते हैं।
ब्रह्मन्, यदि श्रीराम को जबर्दस्ती ले जाओगे, तो उस कल्प में आपसे मैं ही मारा जाऊँगा, मरे
बिना मैं अपनी निश्चित विजय नहीं देखता हूँ