Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 9, Verses 1–2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 9, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
वाल्मीकिरुवाच ।
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य स्नेहपर्याकुलेक्षणम् ।
समन्युः कौशिको वाक्यं प्रत्युवाच महीपतिम् ॥ १ ॥
करिष्यामीति संश्रुत्य प्रतिज्ञां हातुमर्हसि ।
स भवान्केसरी भूत्वा मृगतामिव वाञ्छसि ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
नौवाँ सर्ग
राजा के निषेध करने पर श्रीविश्वामित्रजी का क्रुद्ध होना और श्रीवसिष्ठजी का श्रीविश्वामित्रजी के
तपोबल और अस्त्र-बल के कथन द्वारा धीरे-धीरे राजा दशरथ को समझाना |
वाल्मीकि ने कहा : हे भरद्वाज, अपने प्रिय पुत्र रामचन्द्रजी में अधिक स्नेह होने के कारण जिन
वचनों को कहते समय दशरथ के नेत्र आँसुओं से भर गये थे, उनके ऐसे बचनों को सुनने के बाद क्रोधित
होकर विश्वामित्र ने राजा से निम्ननिर्दिष्ट वाक्य कहा : मैं आपके आदेश का अवश्य पालन करूंगा"
इस प्रकार पहले प्रतिज्ञा कर उसको छोड़ना चाहते हो, इसका मतलब यह होता है कि आप सिंह होकर
मानों अब मृग बनने की इच्छा कर रहे हो