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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 9, Verses 3–4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 9, verses 3–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 3,4

संस्कृत श्लोक

राघवाणामयुक्तोऽयं कुलस्यास्य विपर्ययः । न कदाचन जायन्ते शीतांशोरुष्णरश्मयः ॥ ३ ॥ यदि त्वं न क्षमो राजन्गमिष्यामि यथागतम् । हीनप्रतिज्ञ काकुत्स्थ सुखी भव सबान्धवः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

राघवों के कुल की यह मर्यादा नहीं है अर्थात्‌ इस प्रकार की झूठी प्रतिज्ञा करना या मिथ्या बोलना रघुवंशियों के लिए अनुचित (निन्दनीय) है। क्या शीतांशु चन्द्रमा की कभी उष्ण किरणें होती है ? हे राजन्‌, अपनी प्रतिज्ञा की पूर्ति करने में अपने को यदि असमर्थ पा रहे हो, तो मैं जैसे आया था वैसे ही वापस जाऊँगा। अपनी प्रतिज्ञा से च्युत होनेवाले हे दशरथ, तुम्हारा, अपने आत्मीयों के साथ, कल्याण हो