Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, Verses 21–23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 102, verses 21–23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 102 · श्लोक 21-23
संस्कृत श्लोक
यः कुण्डवदरन्यायो यो घटाकाशयोः क्रमः ।
स्थितिर्देहात्मनोः सैव सविनाशाविनाशयोः ॥ २१ ॥
बदरं हस्तमायाति यथा स्फुटति कुण्डके ।
आत्मा गगनमायाति तथा चलति देहके ॥ २२ ॥
कुम्भे गच्छत्यकुम्भत्वं कुम्भाकाशो यथाम्बरे ।
तिष्ठत्येवमयं क्षीणे देहे देही निरामयः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
बटलोई और बेर का जो न्याय
है और घड़े और आकाश का जो न्याय है, वही न्याय विनाशी ओर अविनाशी देह और आत्मा
का है। जैसे बटलोई के फूटने पर बेर हाथ में आ जाता है वैसे ही देह के नष्ट होने पर जीव
वासनाकाश को प्राप्त हो जाता है। जैसे घड़े के फूटने (चूर-चूर होने) पर घटाकाश महाकाश
में स्थित हो जाता है वैसे ही देह के विनष्ट होने पर यह निर्दोष देही (जीव) परमात्मा में
स्थित होता हे