Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 102, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 102 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
देशकालतिरोधाने मूढोऽपि मरणे नरः ।
किं बिभेति महाबाहो नेह पश्यति कश्चन ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
मरण क्या है ? इस प्रश्न पर कहते हैं ।
हे महाबाहो, मरण देश और काल का तिरोधानमात्र ही है देश-काल का तिरोधानमात्र
मरण होने पर मूढ पुरुष क्यों भयभीत होता है ? यह निश्चित समझिये कि अपना नाश तो कोई
देख ही नहीं सकता है। घर आदि में अपने अन्तिम समय दूसरों की दृष्टि से अपना छिप जाना
ही मरण है, आत्मनाश मरण नहीं है, यह भाव है