Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 103, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 103, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 103 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
मनःसर्वजनक्रीडानृजम्बाललवेष्वतः ।
किमेतद्धि पदार्थेषु रूढं जगति कल्प्यते ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
यह जगत् एकमात्र मन की कल्पना है इसमें कोई पदार्थ वास्तविक नहीं हो सकता, ऐसा
कहते हैं।
इस कारण मन की सम्पूर्ण जनरूप से जो क्रीड़ा है उस क्रीड़ा में मनुष्य देहरूप कीचड़ में
जो रूप सत्य सा कल्पित है, वह क्या कुछ सत्य हो सकता है ? अर्थात् कुछ भी सत्य नहीं
है