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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 107, Verse 48

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 107, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 107 · श्लोक 48

संस्कृत श्लोक

आक्रुष्टमुद्धुरतरं रुदितं विपत्सु भुक्तं कदन्नमुषितं हतपक्कणेषु । कालान्तरं बहु मयोपहतेन तत्र दुर्वासनानिगडबन्धगतेन सभ्याः ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

हे सभासद, दुर्वासनारूपी बेडी से वधे हुए अभागे मैंने वहाँ पर आप लोगों को जितना समय मालूम हुआ, उसकी अपेक्षा कहीं अधिक समय तक क्रोधावेश से भद्दी-भद्दी गालियाँ दी, आपत्तियो में खूब जोर से रोया, रूखा-सूखा मोटा अन्न खाया,भीलों की टूटी-फूटी गन्दी टोली में निवास किया