Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verses 18–19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 110, verses 18–19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 18, 19
संस्कृत श्लोक
मनः पश्य भवत्यक्षि श्रृण्वच्छ्रवणतां गतम् ।
त्वग्भावं स्पर्शनादेति घ्राणतामेति जिघ्रणात् ॥ १८ ॥
रसनाद्रसतामेति विचित्रास्तत्र वृत्तिषु ।
नाटके नूटवद्देहे मन एवानुवर्तते ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
मन जब देखता है चक्षु हो जाता है, जब सुनता है तब श्रोत्रता को प्राप्त होता है,
स्पर्श करने से वह त्वग्भाव को प्राप्त होता है, सूँघने से वह प्राणता को प्राप्त होता है, रस का
स्वाद लेने से जिह्ला बन जाता है । नाटक में जैसे एक ही नट वेशभूषा के परिवर्तन से नाना
आकारो को प्राप्त होता है वैसे ही देह में इन पूर्वोक्तविचित्र वृत्तियों में मन की ही अनुवृत्ति
होती है