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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 117, Verses 2–3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 117, verses 2–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 117 · श्लोक 2, 3

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अज्ञानभूः सप्तपदा ज्ञभूः सप्तपदैव हि । पदान्तराण्यसंख्यानि भवन्त्यन्यान्यथैतयोः ॥ २ ॥ स्वयत्नसाधकरसान्महासत्ताभरोन्नतेः । एते प्रतिपदं बद्धमूले संफलतः फलम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

हास और वृद्धि देखी जाती है एवं उन-उन कारणों से ये सब भूमिकाएँ अपने-अपने विषय से बद्धमूल होकर अपने-अपने अनुरूप संसार स्थित दुःखरूप तथा संसार से मुक्ति निरतिशयानन्द-प्राप्तिरूप उत्तम फल को उत्पन्न करती हैँ । जैसे नीचे की भूमिका के सात पद उत्तरोत्तर रजोगुण, तमोगुण और दुःख से पूर्ण नरक पर्यन्त हैं तथा ऊपर की भूमिका के उत्तरोत्तर सत्त्वगुण, सुख और ज्ञान से पूर्ण सत्यलोक पर्यन्त सात पद हैं तथा क्रममुक्ति उनका फल है वैसे ही ये अज्ञानभूमिका और ज्ञानभूमिका भी हैं यह अर्थ है