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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 118, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 118, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 118 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

सत्यावबोधो मोक्षश्चैवेति पर्यायनामनी । सत्यावबोधो जीवोऽयं नेह भूयः प्ररोहति ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्वापर अवस्थाओं से कल्पित अवान्तर प्रवृत्ति निपित्तभूत भेद के, जो कि मिथ्याभूत है, नष्ट होने पर अवबोध और मोक्ष पदों की ब्रह्मरूप एकार्थमात्र में निष्ठा होने से पयायरूपता सिद्ध हुई, क्योकि उक्त प्रकार का जीव फिर उत्पन्न नहीं होता, जिससे कि उन दोनों में भेद होने से पययता न हो, इस आशय से कहते हैं । सत्यावबोध और मोक्ष ये दोनों ही पर्यायवाचक शब्द हैं, क्योंकि जिस जीव को सत्य अवबोध हो जाता है, उसे फिर इस संसार में जन्म लेना नहीं पड़ता इससे सिद्ध हुआ कि जो सत्यावबोध है, वही मोक्ष हे