Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 118, Verses 5–7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 118, verses 5–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 118 · श्लोक 5-7
संस्कृत श्लोक
ज्ञानभूमिः शुभेच्छाख्या प्रथमा समुदाहृता ।
विचारणा द्वितीया तु तृतीया तनुमानसा ॥ ५ ॥
सत्त्वापत्तिश्चतुर्थी स्यात्ततोऽसंसक्तिनामिका ।
पदार्थाभावनी षष्ठी सप्तमी तुर्यगा स्मृता ॥ ६ ॥
आसामन्ते स्थिता मुक्तिस्तस्यां भूयो न शोच्यते ।
एतासां भूमिकानां त्वमिदं निर्वचनं श्रृणु ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
पहली ज्ञानभूमिका शुभेच्छा कही गई है, दूसरी का नाम
विचारणा है, तीसरी तनुमानसा कही जाती है, चौथी सत्त्वापत्ति है, उसके बाद पाँचवी
असंसक्ति नाम की योगभूमिका है, छठी पदार्थाभावनी है एवं सातवीं तुर्यगा कहलाती है ।
मुक्त मन के अन्त में स्थित है । उसमें फिर शोक नहीं होता । हे श्रीरामचन्द्रजी, इन सात
भूमिकाओं के पृथक्-पृथक् लक्षणों को आप सुनिये