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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 118, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 118, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 118 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

स्थितः किं मूढ एवास्मि प्रेक्ष्येऽहं शास्त्रसज्जनैः । वैराग्यपूर्वमिच्छेति शुभेच्छेत्युच्यते बुधैः ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

मैं मूढ होकर ही क्यों स्थित हूँ, विचारित वेदान्तवाक्यों से ओर गुरूजनों से परमतत्त्व को देखूँगा, इस प्रकार की साधन चतुष्टय सम्पत्तिपूर्वक जो इच्छा है, उसे विद्धान्‌ लोग शुभेच्छा कहते हैं । निष्कर्ष यह निकला कि निषिद्ध कृत्यो के त्याग, निष्काम दान आदि के अनुष्ठान से उत्पन्न, संन्यास- साधनचतुष्टयसम्पत्ति से युक्त मुक्तिपर्यन्त रहनेवाली, श्रवण आदि में प्रवृत्ति के फलरूप आत्म-साक्षात्कारकी उत्कट इच्छा ही पहली भूमिका है