Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 120, Verses 4–5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 120, verses 4–5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 120 · श्लोक 4 , 5
संस्कृत श्लोक
इति निश्चित्य सचिवैः प्रययौ दक्षिणापथम् ।
पुनर्दिग्विजयायेव प्राप्य विन्ध्यमहीधरम् ॥ ४ ॥
पूर्वदक्षिणपाश्चात्यमहार्णवतटस्थलीम् ।
बभ्राम कौतुकात्सर्वां व्योमवीथीमिवोष्णगुः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
यों विचार कर राजा मन्त्रियों के साथ दक्षिण दिशा को गये । पुन:दिगविजय के लिए
मानों विन्ध्यपर्वत को प्राप्त कर राजा लवण ने जैसे सूर्य सम्पूर्ण आकाश मार्ग में भ्रमण करते
हैं वैसे ही पूर्व, दक्षिण और पश्चिम महासमुद्रों की तटभूमियों में कौतूहल से भ्रमण किया