Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verse 60
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 21, verse 60 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 60
संस्कृत श्लोक
यथा सत्यपरिज्ञानाद्रज्ज्वा सर्पो न दृश्यते ।
तथातिवाहिकज्ञानाद्दृश्यते नाधिभौतिकः ॥ ६० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सत्य के परिज्ञान से रज्जु में सर्प नहीं दिखलाई देता वैसे आतिवाहिक शरीर के ज्ञान
से आधिभौतिक शरीर नहीं दिखाई देता। कल्पित दृश्य प्रपंच पहले था, ज्ञान से उसकी समूल
निवृत्ति हो गई है, इस प्रकार की व्यवहार-कल्पना स्थूल दृष्टि से ही होती है, तत्त्वद्रष्टि से तो
उसकी भी संभावना नहीं है, ऐसा कहती हैँ ।
कल्पना यदि किसी के द्वारा समर्थित हो, तो उसकी भी ज्ञान से निवृत्ति हो जाती है, जो
शिला हे ही नहीं, उसका भी तो उपयोग किया ही गया हे, काल्पनिक पदार्थो का भी अज्ञानदशा
में उपभोग देखा ही जाता है, ज्ञान होने पर उनकी निवृत्ति हो जाती है, यह भाव हे