Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 34, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
चलत्पद्मं सर इव वहद्विहगमेव च ।
नभः शूरशिरःकीर्णं भाति तारकिताकृति ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसमें हंस, सारस आदि पक्षी उड़ रहे हैं और कमल हिल रहे हैं ऐसे तालाब
के समान शूरवीर पुरुषों के मस्तकों से व्याप्त आकाश तारांकित सा (सितारों से व्याप्त सा)
मालूम पड़ता है