Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 34, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
भटो मरणमूर्च्छान्ते निमेषेणामरं वपुः ।
स्वकर्मशिल्पिरचितं प्राप्तः स्वप्नपुरं यथा ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सोया हुआ पुरुष एक निमेष
में स्वप्ननगर को प्राप्त होता है, वैसे ही योद्धा भी मरणकाली न मूर्छा के बाद एक निमेष में
अपने कर्मरूपी शिल्पी द्वारा निर्मित दिव्य शरीर को प्राप्त हुआ