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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 36, Verses 20–21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 36, verses 20–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

दिव्याष्टकजनानीकं पक्षद्वयतया तया । अर्धेनार्धेन कुपितं भूपालाभ्यां तथा स्थितम् ॥ २० ॥ मध्यदेशादिसंख्याने प्राग्दिभ्योऽभ्यागतानिमान् । लीलानाथस्य पद्मस्य पक्षे जनपदाञ्छृणु ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

आयुध विद्या, बुद्धि, बल, शूरता, अस्त्रशस्त्र, घोड़े, रथ ओर धनुष ये आठ जिनके अप्रतिहत हैं, ऐसे योद्धा ओं की सेना पूर्व में प्रतिपादित द्वन्द्वशः मिले हुए दो पक्ष होने से दोनों की सेनाओं में आधे-आधे भाग मेँ कुपित होकर स्थित रही, क्योकि दोनों राजा विदूरथ ओर सिन्धुराज उनके अनुकूल ही स्थित रहे । अथवा यह मानना चाहिए यक्ष, राक्षस पिशाच ओर असुर एक ओर, देवता, गन्धर्व, किन्नर ओर विद्याधर एक ओर यों आठ दिव्य पुरुषों का समूह भावी जय ओर पराजय के अनुसार दो पक्षों में बँटकर सम्पूर्णं सेना के आधे आधे भाग से कुपित होकर स्थित हुआ, क्योकि वे दो राजे भी तदनुरूप अदृष्ट से युक्त थे