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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 37, Verses 27–29

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 37, verses 27–29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 27,28

संस्कृत श्लोक

यदम्बुदैरिवोड्डीनं शस्त्रवृन्दैर्नभोङ्गणे । तद्दृष्टं वीचिवलनैर्लोलैः प्लुतमिवार्णवे ॥ २७ ॥ शतचन्द्रं सितच्छत्रैः शरैः शलभनिर्भरम् । शक्तिभिः किल नीरन्ध्रं दृष्टमाकाशकाननम् ॥ २८ ॥ वीरासवसमाक्रन्दकारिणः केकयैः कृताः । कङ्कैः कङ्ककुलाक्रान्तव्योमोद्धूलितमस्तकाः ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

भूमिस्थित लोगों ने शस्त्रसमुदाय को मेघो की नाई आकाशमण्डल में उड़ा देखा, आकाश में स्थित लोगों ने उसे सागर मेँ अन्य तरंगों के प्लवन (तैरने) की नाई देखा । लोगों ने आकाशरूपी वन को सफेद छातों से सैकड़ों चन्द्रो से युक्त सा देखा, बाणो से टिड्डियों से अत्यन्त व्याप्त सा देखा ओर शक्तियों से निरवकाश देखा