Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 38, Verses 47–48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 38, verses 47–48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 38 · श्लोक 47,48
संस्कृत श्लोक
शिलाशिखरसंजाततालजालमिवाततम् ।
तरद्रक्तनदीतीरजातकुन्तोन्नतद्रुमम् ॥ ४७ ॥
नागांसस्यूतहेत्योघवृक्षांशुकुसुमाकुलम् ।
कङ्ककृष्टान्त्ररसनावृन्दजालकिताम्बरम् ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
बह रही रुधिर की नदी के अगल बगल लगे हुए मुर्दो पर गड हुए कुन्त ही उन्नत वृक्ष थे, वे ऐसे
प्रतीत हो रहे थे, मानों चट्टानों के ऊपर उगे हुए घने ताल के झुरमुट हों । हाथियों के विभिन्न
अंगों में चुभे हुए हथियारों के समूह रूपी वृक्षों के किरण रूपी फूल वहाँ पर जहाँ तहाँ बिखरे थे,
सफेद चीलों द्वारा खींची गई अंतङीरूपी रस्सियों से युद्ध भूमिका आकाशमण्डल मानों जालं
से छा गया था