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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 38, Verses 49–51

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 38, verses 49–51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 38 · श्लोक 49-51

संस्कृत श्लोक

असृक्सरित्तीरजातकुन्तोन्नतवनद्रुमम् । असृक्सरोवरोर्ध्वस्थपताकानलिनीगणम् ॥ ४९ ॥ रक्तकर्दमनिर्मग्ननराहूतसुहृज्जनम् । करीन्द्रकुणपापातनिर्यद्भग्नजनेक्षितम् ॥ ५० ॥ हेतिलूनलतैर्वृक्षैः संदिग्धार्धकबन्धकम् । असृङ्गदीवहद्धस्तिकटकर्पटनौगणम् ॥ ५१ ॥

हिन्दी अर्थ

रुधिर की नदी के तीर पर लगे हुए ऊँचे ऊँचे भाले ही उसमें ऊँचे ऊँचे वन वृक्ष थे ओर रुधिर के कुण्डं के ऊपर स्थित पताकाएँ ही कमलवृन्द थे । रुधिर के कीचड़ में फँसे हुए जन अपने अपने मित्रों को पुकारते थे। मत्त मातंगो के शवों से कुछ निकले हुए अंगभग्न लोगों द्वारा युद्धभूमि कातर दृष्टि से देखी गई थी, हथियारों से जिनकी लताएँ कट गई थी ऐसे वृक्षों से कबन्धो का सन्देह होता था, रुधिर की नदियों में बह रहे हाथियों के मस्तक और अम्बारी ही वहाँ पर नौकाएँ थी