Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 45, Verses 21–22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 45, verses 21–22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
चिद्भाव एव ननु सर्गगतोऽन्तरात्मा ।
यच्चेतति प्रयतते च तदैति तच्छ्रीः ॥ २१ ॥
रम्यं ह्यरम्यमथवेति विचारयस्व ।
यत्पावनं तदवबुध्य तदन्तरास्स्व ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
यह निश्चित है कि सर्वान्तियमिी चिद्भाव (चित्सत्ता) ही पहले
रम्य यानी शारत्रविहित अथवा अरम्य यानी शारत्रनिषिद्ध जिस कर्म का विचार करता है और
प्रयत्न करता है, बाद मेँ उसीकी फलरूप श्री उदित होती है, ऐसा तुम विचार करो ओर विचार
से जो पवित्रतम पद है, उसको जानकर उसमें स्थित होओ