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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 47, Verse 12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 47, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

असृजन्जीवसङ्घान्ये संध्यायां तारका इव । शनैः प्रकटतां जग्मुर्नीलाकाशाद्रिभूमयः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

नीला आकाश और पर्वतश्रेणियाँ धीरे-धीरे प्रकट होने लगी । सम्पूर्ण भुवन काजल के सागर में से निकाला हुआ-सा शोभित हुआ