Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 49, Verses 2–3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 49, verses 2–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 2,3
संस्कृत श्लोक
पक्षिवद्भ्रान्तवृक्षौघाः पतनोत्पातनोद्भटाः ।
विकुट्टिताट्टालखण्डाश्चाभ्रभित्तिविभेदिनः ॥ २ ॥
तेनातिभीमवातेन विदूरथरथोऽप्यथ ।
उह्यमानोऽभवन्नद्या यथा जर्जरपल्लवः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त
वायुओं ने वृक्षों के झुण्डके झुण्ड को पक्षियों की नाई आकाश में उड़ा दिया, बड़े-बड़े योद्धाओं
को पृथिवी में पछाड़ दिया और आकाश में उड़ा दिया बड़े-बड़े महलों की अटारियों के हिस्से
को चूर-चूर कर दिया और बादलरूपी भीत को छिन्न भिन्न कर दिया। उस भीषण वायु से
राजा विदूरथ का रथ भी जैसे जीर्ण पत्ता नदी के वेग से बहाया जाता है, वैसे ही बहाया
गया