Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 51, Verses 1–14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 51, verses 1–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 51 · श्लोक 1-14
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
हतो राजा हतो राजा प्रतिराजेन संयुगे ।
इतिशब्दे समुद्भूते राष्ट्रमासीद्भयाकुलम् ॥ १ ॥
भाण्डोपस्करभाराढ्यं विद्रवच्छकटव्रजम् ।
साक्रन्दार्तकलत्राढ्यं द्रवन्नागरदुर्गमम् ॥ २ ॥
पलायमानसाक्रन्दं मार्गाहृतवधूगणम् ।
अन्योन्यलुण्ठनव्यग्रलोकलग्नमहाभयम् ॥ ३ ॥
परराष्ट्रजनानीकताण्डवोल्लाससारवम् ।
निरधिष्ठितमातङ्गहयवीरपतज्जनम् ॥ ४ ॥
कपाटपाटनोड्डीनकोशान्तरवघर्घरम् ।
लुण्ठितासंख्यकौशेयप्रावृताभिभटोद्भटम् ॥ ५ ॥
क्षुरिकोत्पाटितार्द्रान्त्रमृतराजगृहाङ्गनम् ।
राजान्तःपुरविश्रान्तचण्डालश्वपचोत्करम् ॥ ६ ॥
गृहापहृतभोज्यान्नभोजनोन्मुखपामरम् ।
सहेमहारवीरौघपादाहतरुदच्छिशु ॥ ७ ॥
अपूर्वतरुणाक्रान्तकेशान्तःपुरिकाङ्गनम् ।
चोरहस्तच्युतानर्घ्यरत्नदन्तुरमार्गगम् ॥ ८ ॥
हयेभरथसंघट्टव्यग्रसामन्तमण्डलम् ।
अभिषेकोद्यमादेशपरमन्त्रिपुरःसरम् ॥ ९ ॥
राजधानीविनिर्माणसारम्भस्थपतीश्वरम् ।
कृतवातायनश्वभ्रनिपतद्राजवल्लभम् ॥ १० ॥
जयशब्दशतोद्धोषसिन्धुराजन्यनिर्भरम् ।
असंख्यनिजराजौघधृतसिन्धुकृतास्थिति ॥ ११ ॥
ग्रामान्तरसमाक्रान्तविद्रवद्राजवल्लभम् ।
मण्डलान्तरसंजातनगरग्रामलुण्ठनम् ॥ १२ ॥
अनन्तचोरमोषार्थरुद्धमार्गगमागमम् ।
महानुभाववैधुर्यसनीहारदिनातपम् ॥ १३ ॥
मृतबन्धुजनाक्रन्दैर्मृततूर्यरवैरपि ।
हयेभरथशब्दैश्च पिण्डग्राह्यघनध्वनि ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
थी, रो रहे भूखे प्यासे स्त्री ओर बालबच्चों को लेकर भाग रहे नागरिकों की अपार भीड़ लगी
थी, राष्ट्र उत्पात मचने के कारण भाग रही और रो रही अनेक युवतियाँ मार्ग में डाकुओं द्वारा
हर ली गई थी, आपस में एक दूसरे को लूटने खसोटने में व्यग्र हुए लोगों को आपस का भी बड़ा
भारी भय लगा रहता था, शत्रु के राष्ट्र को असैनिक जनता और सैनिकों के विजयप्रयुक्त
ताण्डवकी वृद्धि से सारा विदूरथ राष्ट्र कोलाहल युक्त था, स्वामियों के मर जाने के कारण
निरंकुश हुए हाथी, घोड़े और वीरों की टक्कर से असैनिक जनता गिर रही थी, कोषगृह का
(खजानों का) विनाश करते समय किवाड़ों को तोड़ने से उत्पन्न हुआ “घर घर” शब्द आकाश
में फैला हुआ था, वहाँ पर प्रबल परपक्षी योद्धाओं ने लूटे गये असंख्य रेशमी वस्त्रों को लपेटकर
कोषगृह के रक्षक सैनिकों को तिरस्कृत कर दिया, मरी हुई राजरानियाँ चोरों द्वारा छूरों से
काटी गई खून से लथपथ अपनी आँतड़ियों से उलझी हुई थी, राजा के अन्तःपुर में डोम-
चाण्डालों के झुण्ड के झुण्ड विश्राम ले रहे थे, राजगृह से लूटपाट द्वारा हस्तगत किये गये राजा
के भोजनयोग्य स्वादु अन्नो के भोजन में गँवार लोग जुटे थे, सोनेकी सिकड़ियों को पहने हुए
बालक योद्धाओं की लातें और ठोकरें खा कर रो रहे थे, अपरिचित युवक अन्तःपुर की महिलाओं
के केशपाश को खींच रहे थे, चोरों के हाथों से मार्ग में गिरे हुए बहुमूल्य रत्नों से बटोही लोग
दन्तुर-से (ऊँचे दांतवाले की नाई से) उज्ज्वल हो रहे थे। हाथी, घोड़े और रथों को छीनकर
लाने में सामन्त लोग व्याकुल हो रहे थे, राजा सिन्धु के पुत्र के राज्याभिषेक कार्य का आदेश
देने में मन्त्री आदि ऊँचे राजकर्मचारी बड़े तत्पर थे, राजधानी के निर्माण केलिए अच्छे अच्छे
कारीगर सन्नद्ध थे, बनाये गए झरोखों के छेदों में सिन्धुराज की रानियाँ अपूर्व नगर की सुन्दरता
देखने के लिए प्रवेश कर रहीं थी, सैकड़ों 'जय जय' उद्घोषों के साथ नगर में प्रवेशित सिन्धुराज
के पुत्रका, जिसका तुरन्त अभिषेक हुआ था, उस राष्ट्र में बड़ा प्रभाव था, राजा सिन्धुने वहाँ
पर जो नई राजव्यवस्था चलाई थी, उसे सिन्धुपक्ष के राजाओंने शिरोधार्य कर लिया था,
अन्यान्य गाँवों में छिपकर रहनेवाले पूर्व राजा के पक्षपाती (प्रीतिपात्र) लोग शत्रु को पता
लगने पर वहाँसे भी भाग रहे थे, चोरों के बड़े भारी गिरोहने लूटपाट करने के लिए मार्गो में
लोगों का आना-जाना रोक रक्खा था, महाप्रतापी राजा विदूरथ के विरह से दिनमें धूप तुषार
से सनी हुई-सी ठण्डी मालूम होती थी, मरे हुए बन्धु-बान्धवों के लिए रोने-धोने से और मरे
हुए जनों के लिए किये गये तूरे शब्द से पिण्ड के सदुश हाथसे पकड़ने योग्य शब्द वहाँ हो रहा
था