Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 53, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
अन्तरनुभूयमानाः संसृतयो बाह्यभूतजालानाम् ।
अविदितवेद्यदृशामपि दूरे पुंसामिवैन्दवं बिम्बम् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि किसी को यह शंका हो कि संसार यदि आन्तर वासनामय है, तो वह बाह्य कैसे प्रतीत
होता है, तो उसका दृष्टान्तपूर्वक समाधान करते हैं।
जिन्हे तत्त्वज्ञान नहीं हुआ है यानी जो अज्ञानी हैं और जो बाहर भूतसमूह को देखते हैं,
उनको संसार का भीतर ही अनुभव होता है, जैसे कि दूर में प्रतीत हो रहा अध्यस्त दूसरा
चन्द्रबिम्ब भी आन्तर अनुभूत होता है इसी युक्ति से कल्पित ये संसृतियाँ भी आन्तर ही हे,
बाह्य नहीं हैं