Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 54, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
तत्रान्तर्ब्रह्म तद्वेत्ति ब्रह्मायमहमित्यथ ।
मनोराज्यं स कुरुते स्वात्मैवं तदिदं जगत् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त ब्रह्माण्ड के
भीतर स्थित हिरण्यगर्भनामक ब्रह्म 'सहसिद्धं चतुष्टयम्" इस पूर्वोक्त स्मृति के अनुसार
अन्तुर्मुखतारूप अंश से यह मैं ब्रह्म हूँ, यह जानता है ओर बाह्यवासनारूप दूषित अंश से
प्राणियों के कर्म के अनुरूप सृष्टि के संकल्परूप से मनोराज्य करता है, वही सत्यसंकल्परूप
मनोराज्य यह जगत् है