Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 54, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
यद्यथा स्फुरितं चित्तं तत्तथा ह्यात्मचिद्भवेत् ।
स्वयमेवानियमतस्तत्तत्स्यान्नेह किंचन ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
भाँति- भाँति की वासनाओं से भरे हुए मन मे, वैसा संकल्पोदय होने पर भी आत्म-चैतन्य
का मन के संकल्पानुसार विवर्त कैसे होता है ? इस शंका पर देवीजी कहती हैँ ।
चित्त जिस जिस प्रकार से स्फुरित होता है, चैतन्य भी स्वयं ही उस प्रकार से स्फुरित
होता है, क्योकि आत्मचैतन्य का यह स्वभाव ही है कि वह स्वच्छ उपाधि में प्रतिफलित होता
है । इसलिए कुछ भी पदार्थ अनियत स्वभावरूप से उत्पन्न नहीं होते