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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verse 15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 54, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

न च नाम नकिंचित्त्वं युज्यते विश्वरूपिणः । त्यक्त्वा समस्तसंस्थानं हेम तिष्ठति वै कथम् ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

मायाशबल ब्रह्म मे अनादिकाल से नियतरूप से स्थित विश्व के आविभवि से भी (नियति की सिद्धि होती है, इस आशय से कहते है । प्रलयकाल में भी विश्वरूपी (विराट्‌) सम्पूर्णं वस्तुओं से शून्य नहीं हो सकता । यदि ऐसा हो जाय तो उसमें कारणता ही नहीं रहेगी, कारण कि सोना कटक, ककण, कुण्डल, रुचक, पिण्डत्व आदि सब आकारो का त्याग करके कैसे रह सकता है ? भाव यह है कि सब आकारो का उसमें अन्तर्भाव है, अतः वह किसीका भी त्याग नहीं कर सकता