Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 54, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
स्वकर्मधर्मे ह्रसति हसत्यायुर्नृणामिह ।
वृद्धे वृद्धिमुपायाति सममेव भवेत्समे ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
इसी प्रकार विहित कर्मो का अनुष्ठान न करना भी आयु के हास का कारण है, ऐसा
कहती हैं ।
अपने कर्मरूप धर्म का हास होने पर मनुष्यों की आयु क्षीण होती है, स्वकर्मधर्म की वृद्धि
होने पर बढ़ती है, स्वकर्मधर्मका शास्त्रानुसार (जितना शास्त्र में कहा गया है उतना ही)
अनुष्ठान होने पर उसमें कमी-बेशी न करनेपर सम ही (उस युगमें जितनी नियत है उतनी
ही) रहती है