Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 54, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
यो यथाशास्त्रमारब्धं स्वधर्मनुमतिष्ठति ।
भाजनं भवति श्रीमान्स यथाशास्त्रमायुषः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
जो पुरुष शास्त्र में जैसा कहा गया है, उसका उल्लंघन किये
विना आरम्भ किये गये अपने धर्म का अनुष्ठान करता है, वह पुण्यात्मा शास्त्रमें वर्णित पूर्ण
आयु का भाजन होता है