Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 56, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
पिण्डोऽथ दीयते मावा पिण्डो दत्तो मयेति चित् ।
वासना हृदि संरूढा तत्पिण्डफलभाङ्गरः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, बन्धुओं द्वारा पिण्ड चाहे दिया
जाय अथवा न दिया जाय, परन्तु यदि प्रेत मेँ “मुञ्चे पिण्ड दिया गया” ऐसी वासना उदित हो
जाय, तो उक्त वासना से ही पुरुष को पिण्डदान का फल शरीर लाभ हो जाता है शास्त्र में
पिण्डप्रदान की विधि पिण्डप्रदान को बन्धुओं का कर्तव्य कहती है यानी मृतक के बन्धुओं को
अवश्य पिण्डप्रदान करना चाहिए, यह बतलाती हे । वस्तुतः वह विधि बन्धुओं को फल देती
है, पर मृतक को भी वासनारूप फल मिलता है, इस शास्त्रसंवाद से दोनों को ही उसका फल
प्राप्त होता है, यह प्रसिद्ध है