Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 58, Verses 16–17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 58, verses 16–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 16,17
संस्कृत श्लोक
सद्वासनस्य रूढायामातिवाहिकसंविदि ।
देहो विस्मृतिमायाति गर्भसंस्थेव यौवने ॥ १६ ॥
एकत्रिंशेऽद्य दिवसे प्राप्ता वयमिहाम्बरे ।
प्रभाते मोहिते दास्यौ मयैते निद्रयाधुना ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
वासनायुक्त (& ) पुरुष में आतिवाहिकभाव के बद्धमूल होने पर जैसे यौवनावस्था
में गर्भ में निवास विस्मृत हो जाता है, वैसे ही आधिभौतिक देह का विस्मरण हो जाता है।
आज इकतीसतवें दिन हम इस मण्डपाकाश में प्राप्त हुई हैं। इस समय प्रभातकाल होने पर
मैंने ही इन दासियों को निद्रा से मोहित कर दिया है