Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 6, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 6, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
सच्छास्त्रसत्संगमजैर्विवेकैस्तथा विनश्यन्ति बलादविद्याः ।
यथा जलानां कतकानुषङ्गाद्यथा जनानां मतयोऽपि योगात् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि को शंका करे कि अन्यान्य अनेक उपायों के विद्यमान रहते साधुसंगति और सत्-
शास्त्रकी ही क्यो प्रशंसा करते हैं तो इस पर कहते हैं।
जैसे निर्मली के चूर्ण के संसर्ग से जलका मैल नष्ट हो जाता है और जैसे योग के अभ्यास
से लोगों की बाह्य मनोवृत्तियाँ विनष्ट हो जाती हैं, वैसे ही सत्-शास्त्र ओर साधुसंगति से
उत्पन्न विवेक से विद्या के विरोधी राग, द्वेष आदि सहसा विनष्ट हो जाते हैं