Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 6, Verses 7–8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 6, verses 7–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 7, 8
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
संपरिज्ञातमात्रेण किलानेनात्मनात्मना ।
पुनर्दोषा न बाधन्ते मरणाद्याः कदाचन ॥ ७ ॥
देवदेवो महानेष कुतो दूरादवाप्यते ।
तपसा केन तीव्रेण क्लेशेन कियताथवा ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
तमेतं वेदानुवचनेन बराह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन (ब्राह्मण उसको
वेदाध्ययन, यज्ञ, दान ओर अविनाशी तप से जानना चाहते है) यह श्रुति डिण्डिमघोष से
यज्ञ, दान और तप को ज्ञान का साधन कहती है, किचिन्नोपकरोति (तप, दान, व्रत आदि
तनिक भी सहायक नहीं होते है) यह कथन कठोरतम तप आदि के विधान की इच्छा से
साधारण तप आदि पर लागू होता है ऐसा समझ रहे श्रीरामचन्द्रजी बोले :
गुरुवर, स्वरूपभूत इस आत्मा के केवल ज्ञात होने से क्लेशदायक जन्म-मरण आदि
उपद्रव फिर कभी नहीं होते हैं । यह महान् देवाधिदेव किस उपाय से अतिशीघ्र प्राप्त होता
है ? यदि कहिए ज्ञान से प्राप्त होता है, तो कृपया बतलाइए कि वह ज्ञान किस दुष्कर तप
से अथवा कितने प्रचुर क्लेश से प्राप्त होता है ?