Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 67, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
संसृतिर्जाग्रदित्युक्तं स्वप्नं विदुरहंकृतिम् ।
चित्तं सुषुप्तभावः स्याच्चिन्मात्रं तुर्यमुच्यते ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
उस शुद्ध आत्मा का
इन्द्रियों द्वारा बाहर निकलना जाग्रत कहा गया है, भीतर अहंभाव से युक्त उसीका हृदयसे
कण्ठ तक निकलना स्वप्न कहा गया है, स्मरण के बीज वासनामात्र से हृदय में स्थिति सुषुप्ति
है, केवल चिन्मात्ररूप से स्थिति तुर्यावस्था हे