Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 75
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 67, verse 75 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 75
संस्कृत श्लोक
यथा यदुदितं वस्तु तत्तत्तन्न विना भवेत् ।
निमेषमपि कल्पं वा स्वभावस्यैष निश्चयः ॥ ७५ ॥
हिन्दी अर्थ
वट के बीज से वटका अंकुर होता है, कुटज के बीज से वट का अंकुर नहीं होता ओर
बुद्बुद कुछ ही निमेष तक रहते हैं, ब्रह्माण्ड महाकल्प तक रहता है, इस प्रकार हेतु, फल
आदि की नियति के बल से भी अपनी इच्छा के अनुसार कल्पना नहीं की जा सकती, ऐसा
कहते हैं।
जो वस्तु जिससे उदित हुई है, उसके बिना वह उदित नहीं होती । निमेष भर कोई रहे या
कल्प भर कोई रहे, यह नियति का निश्चय हे