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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verses 78–79

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 67, verses 78–79 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 78,79

संस्कृत श्लोक

जलमन्यत्तरङ्गोऽन्य इति बालकुकल्पनया भेदः कल्प्यत एवमवास्तवस्तस्माद्यो योऽयमाभाति भेदः । स केवलमतत्त्वविद्भिः परिकल्पितो रज्ज्वां सर्प इव एवं भेदाभेदशक्त्योररिमित्रयोरेव ब्रह्मण्येव संभवेत् ॥ ७८ ॥ तेनात्मनाऽद्वितीयेनैव द्वित्वमिवाततं यथासलिलेन तरंगकल्पनया सुवर्णेन कटककल्पनयैवमिति अतस्तेन स्वयमेवात्मनात्मान्य इव चेत्यते ॥ ७९ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे जल भिन्न है और तरंग भिन्न हे, ऐसी मूर्खो की कुकल्पना से अवास्तविक भेद प्रतीत होता है, वैसे ही जो यह जगत्‌ का भेद प्रतीत होता है, वह भी अवास्तविक है केवल अज्ञानियों ने उसकी कल्पना कर रक्खी है । जल का तरंग परिणाम है, यह माना जाय तो विवर्त स्फुट नहीं होगा, इसलिए दूसरा दृष्टान्त देते हैं । जैसे रज्जुमें सर्प की स्थिति है, वैसे ही ब्रह्म में ही शत्रु और मित्र के समान विरुद्ध और अविरुद्ध कभी भी अपने स्वभाव का परित्याग न करनेवाली भेदाभेदशक्तियों की स्थिति है । जैसे जल तरंगों की कल्पना से द्वित्व का विस्तार करता है, जैसे सुवर्ण कटक की कल्पना से द्वित्व का विस्तार करता है, वैसे ही उसी अद्वितीय प्रत्यक्‌ आत्माने मानों द्वित्व का विस्तार कर रक्खा है । अतः उस आत्मा से स्वयं अन्य आत्मा का अनुभव होता है