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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 80

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 67, verse 80 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 80

संस्कृत श्लोक

अतः कलना जाता सैव स्फारतां प्राप्य मनः संपन्नं तेनाहंभावः कल्पितो निर्विकल्पप्रत्यक्षरूपमेतत्प्रथमं तन्मनस्तदहं भवति क्षिप्रमहंशब्दार्थभावनात् ॥ ८० ॥

हिन्दी अर्थ

इस ब्रह्म से निर्विकल्प जगत्‌ का स्फुरण हुआ, वही सविकल्पता को प्राप्त होकर मन बन गया, उसने अहंभावकी कल्पना की । यह पहले निर्विकल्प प्रत्यक्षरुप था, वह मन होता है, शीघ्र “अहम्‌” शब्द के अर्थ की भावना करने से “अहम्‌' होता है