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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 74, Verses 10–11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 74, verses 10–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 10,11

संस्कृत श्लोक

समुल्लङ्घ्याभ्रमार्ग तु वातस्कन्धानतीत्य च । सिद्धवृन्दानधः कृत्वा सूर्यमार्गमुपेत्य च ॥ १० ॥ ऊर्ध्वमेत्य विमानेभ्यः प्राप शक्रपुरान्तरे । सूचीदर्शनपुण्यं तमालिलिङ्ग पुरंदरः ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

मेघमार्ग को लाँधकर और उन चास वायुओं के स्तरों का अतिक्रमण कर सिद्धों को अपने से नीचे करके सूर्यमार्ग में प्राप्त होकर विमानों से यानी वैमानिकप्रधान नक्षत्र लोक के ऊपर चढ़कर वह इन्द्रपुरी में पहुँचा । सूची के दर्शन से अति पुनीत हुए वायु का इन्द्र ने आलिंगन किया