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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 74, Verses 13–15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 74, verses 13–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 13-15

संस्कृत श्लोक

वायुरुवाच । जम्बूद्वीपेऽस्ति शैलेन्द्रो हिमवान्नाम सून्नतः । जामाता यस्य भगवान्साक्षाच्छशिकलाधरः ॥ १३ ॥ तस्योत्तरे महाशृङ्गपृष्ठे परमरूपिणी । स्थिता तपस्विनी सूची तपश्चरति दारुणम् ॥ १४ ॥ बहुनात्र किमुक्तेन वाताद्यशनशान्तये । यया स्वोदरसौषिर्यं पिण्डीकृत्वा निवारितम् ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

हे महेन्द्र, जम्बूद्वीप में अत्यन्त उन्‍नत हिमालय नाम का पर्वतराज है, जिसके साक्षात्‌ भगवान्‌ चन्द्रशेखर जमाई हैं, उसके उत्तर तरफ के बड़े शिखर के ऊपर महातेजस्विनी तपस्विनी सूची खड़ी होकर भीषण तपस्या कर रही है, उसकी तपस्या का बहुत क्या वर्णन करूँ ? उसने मुझसे वायु आदिका भी भोजन न हो, इसलिए अपने उदरके छिद्र को लोहपिण्ड बनाकर नष्ट कर डाला है