Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 75, Verses 12–13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 75, verses 12–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 12,13
संस्कृत श्लोक
यया पूर्वं वियुक्तासि तन्वा जलदरूपया ।
बीजान्तवृक्षता पुत्रि बृहद्वृक्षतया यथा ॥ १२ ॥
योगमेष्यसि भूयश्च तन्वान्तर्बीजरूपिणी ।
तयैव रससेकेन लतयेवाङ्कुरस्थितिः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे पहले बीज के अन्दर रहनेवाली वृक्षत्वजाति महद्वृक्षस्वरूप व्यक्ति
से वियुक्त रहती है, वैसे ही मेघ के समान आकारवाले जिस शरीर से तुम पहले वियुक्त हुई
हो हे पुत्रि ! जैसे अंकुर-स्थिति जल के सिंचन से लतारूप में परिणत हो जाती है, वैसे ही
अन्तर्वीजरूपिणी (सूची के अन्दर बीजरूप से अवस्थित) तुम फिर उस शरीर से युक्त हो
जाओगी