Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 75, Verses 14–17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 75, verses 14–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 14-17
संस्कृत श्लोक
बाधां विदितवेद्यत्वान्न च लोके करिष्यसि ।
अन्तःशुद्धा स्पन्दवती शारदीवाभ्रमण्डली ॥ १४ ॥
अश्रान्तध्याननिरता कदाचिल्लीलया यदि ।
भविष्यसि बहीरूपा सर्वात्मध्यानरूपिणी ॥ १५ ॥
व्यवहारात्मकध्यानधारणाधाररूपिणी ।
वातस्वभाववद्देहपरिस्पन्दाद्विलासिनी ॥ १६ ॥
तदा विरोधिनी पुत्रि स्वकर्मस्पन्दरोधिनी ।
न्यायेन क्षुन्निवृत्त्यर्थं भूतबाधां करिष्यसि ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
जलशून्य होने के कारण शुभ्र स्पन्दरहित शरत्कालकी मेघमण्डली के
समान ज्ञानी होने के कारण तुम लोक में किसी को पीड़ा नहीं पहुँचाओगी | सदा ध्यान में मग्न
रहनेवाली तुम जब कभी लीलावश निर्विकल्प समाधि से व्युत्थित होओगी, तब न्याय से भूतों
की बाधा करोगी यानी प्राणियों को दुःख दोगी, तब व्यवहारात्मक ध्यान धारणा की आधारभूत,
वातस्वभाववाली देह के चलन से इधर उधर घूमनेवाली और अपने राक्षसजाति के उचित
अशास्त्रीय हिंसा आदि कर्मरूप स्पन्द की विरोधिनी होकर तुम अपनी क्षुधा की निवृत्ति के
लिए न्यायपूर्वक प्राणियों को पीडित करोगी