Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 75, Verses 3–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 75, verses 3–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 3 ,4
संस्कृत श्लोक
पूर्णास्मि गतसंदेहा किं वरेण करोम्यहम् ।
शाम्यामि परिनिर्वामि सुखमासे च केवलम् ॥ ३ ॥
ज्ञातं ज्ञातव्यमखिलं शान्ता संदेहजालिका ।
स्वविवेको विकसितः किमन्येन प्रयोजनम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
उसके विचार-प्रकार को ही स्पष्टरूप से कहते हैं ।
मैं पूर्ण हो गई हूँ, मेरे सब सन्देह कट गये हैं, मैं वर से क्या करूँ, मैं शान्त हूँ, परम निर्वाण
को प्राप्त हो गई हूँ मुञ्चे अब अन्य वरदान से क्या प्रयोजन है ?2