Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 78, Verses 10–19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 78, verses 10–19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 10-19
संस्कृत श्लोक
ततो ददृशतुस्तां तौ शब्दपूरितदिग्गणाम् ।
साट्टहासप्रभापिण्डपूरप्रकटिताकृतिम् ॥ १० ॥
कल्पाभ्राशनिकाषेण घृष्टामद्रितटीमिव ।
स्वनेत्रविद्युद्वलयबलाकोज्ज्वलिताम्बराम् ॥ ११ ॥
तिमिरैकार्णवौर्वाग्निज्वालाविवलनामिव ।
गर्जद्धनघटाटोपपीवरासितकन्धराम् ॥ १२ ॥
रणद्दशनसरम्भहाहाहतनिशाचराम् ।
रोदसीकज्जलस्तम्भां लीलयोल्लसितां पुनः ॥ १३ ॥
ऊर्ध्वकेशीं शिरालाङ्गीं कपिलाक्षीं तमोमयीम् ।
यक्षरक्षःपिशाचानामप्यनर्थभयप्रदाम् ॥ १४ ॥
देहरन्ध्रविशच्छ्वासवातभांकारभीषणाम् ।
मुसलोलूखलालातहलशूर्पकशेखराम् ॥ १५ ॥
स्फुरन्तीमिव कल्पान्ते वैदूर्यशिखरस्थलीम् ।
हासघट्टितविश्वेशां कालरात्रिमिवोदिताम् ॥ १६ ॥
शरद्व्योमाटवीं साभ्रां कृतदेहामिवागताम् ।
शरीरिणीं महाभ्राढ्यां यामिनीमिव मांसलाम् ॥ १७ ॥
शरीरसंनिवेशेन पङ्कपीठमिवोत्थिताम् ।
तनुं चन्द्रार्कयुद्धाय तमसेव समाश्रिताम् ॥ १८ ॥
इन्द्रनीलमहाशुभ्रलम्बाभ्रयुगलोपमौ ।
उलूखलादिहारौघौ दधानामसितौ स्तनौ ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
आँखें थी, वह ऐसी काली थी मानों अन्धकार से ही उसकी रचना हुई हो, यक्ष, राक्षस ओर
पिशाचो को भी वह मरण आदि का भय देती थी । देहरन्ध्र में प्रविष्ट हो रहे श्वासवायु के
झंकारशब्द से वह बड़ी भयावनी लगती थी । मूसल, ऊखल, उल्मुक (अधजला काष्ठ), हल
ओर ट्टे फूटे सूप उसके शिरोभूषण थे, वह प्रलयकाल में दैदीप्यमान वैदूर्य पर्वत की शिखर
स्थली के समान थी, जिसने अपने हास से विश्व के अधिपति दानव मार डाले थे ऐसी कालरात्रि
(शिवदूति के) के समान वह उदित हुई थी । मानों मेघयुक्त शरत्-काल का आकाशरूपी
महावन ही देह धारण करके आया हो, मानों वह बड़े-बड़े मेघो से युक्त मूर्तिमती खूब अंधेरी
रात्रि थी शरीर धारण करके पृथ्वी की पीठ के समान उठी हुई थी, वह ऐसी लगती थी मानों
चन्द्र एवं सूर्य के साथ युद्ध करने के लिए राहु के द्वारा धारण की गई देह हो । उसके इन्द्रनील
मणि के समान अत्यन्त काले, जल से भरे दो मेघो के समान तथा ऊखल आदि के हारो के
धारण करनेवाले काले स्तन थे