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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verses 2–5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verses 2–5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 2-5

संस्कृत श्लोक

राजोवाच । जागतप्रत्ययाभावो यस्याहुः प्रत्ययं परम् । सर्वसंकल्पसंन्यासश्चेतसा यत्परिग्रहः ॥ २ ॥ यत्संकोचविकासाभ्यां जगत्प्रलयसृष्टयः । निष्ठा वेदान्तवाक्यानामथ वाचामगोचरः ॥ ३ ॥ कोटिद्वयान्तरालस्थं मध्ये कोटिद्वयीमयम् । यस्य चित्तमयी लीला जगदेतच्चराचरम् ॥ ४ ॥ यस्य विश्वात्मकत्वेऽपि खण्ड्यते नैकपिण्डता । सन्मात्रं तत्त्वया भद्रे कथ्यते ब्रह्म शाश्वतम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

राजा राक्षसी के अभिप्राय को जानकर सव प्रश्नों के मुख्य तात्पर्यविषय ब्रह्म को विरोधाभासोक्तिपूर्वक चमत्कारातिशय से दशति है। जाग्रत्‌, स्वप्न, सुषुप्ति इन तीन अवस्थाओं को विषय करनेवाली जगतप्रतीतिका (द्वेतका) अभाव यानी निवृत्ति (तत्वज्ञान) ही, जिसका परम दर्शन है, जो सम्पूर्ण संकल्पो का त्यागरूप है या सब संकल्पो की विरामभूमि है, जो तन्मात्रनिष्ठता रूप चित्त संयमका फलस्वरूप है, जिसके मायिक संकोच ओर विकाससे जगत्‌ के प्रलय और सृष्टि होते हैं, जो वेदान्तवाक्यों का निष्ठारूप (तात्पर्यरूप) है और जो स्वयं वाणी का अगोचर है, सत्ता ओर असत्ता, भान और अभान इन दो कोटियो के मध्यमे स्थित यानी अनिर्वचनीय अतएव आदि और अन्त मेँ असत्कोटि से ग्रस्त होने पर भी मध्य में दैशिक परिच्छेद से कहीं पर है और कहींपर नहीं है, इस प्रकार कोटिद्रयमय यह चराचर जगत्‌ जिसकी चित्तमयी लीला है, विश्वात्मक होने पर भी जिसकी अखण्डता वस्तुतः खण्डित नहीं होती, उस सन्मात्र शाश्वत ब्रह्म को तुम पूछ रही हो