Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
एषोऽणुर्वेदनाद्वायुः स्वभ्रान्तिर्दृगदृश्यत ।
अतो न किंचिद्वाय्वादि केवलं शुद्धचेतनम् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
यह ब्रह्माणु अपने को वायुरूप से देखकर माया
के विवर्तं से वायु हुआ है, इसलिए वह अन्यथाग्रहणरूप ज्ञान भ्रान्तिकी महिमा है, परमार्थतः
वह अवायु हे ओर भ्रान्तिदर्शन से वायु है । यानी जो वायु है, वह वस्तुतः केवल शुद्ध चेतन
ही हे उससे अतिरिक्त दूसरी वस्तु नहीं हे