Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 73
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verse 73 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 73
संस्कृत श्लोक
बोधाद्गलितदृश्यस्य द्रष्टुः सत्तेव भासते ।
अबुद्धे कटके स्वस्य हेम्नोऽकटकता यथा ॥ ७३ ॥
हिन्दी अर्थ
कौन ज्ञान से दृश्य के नष्ट हो जाने के कारण अखण्डित अपने आत्मा को दृश्य की
असिद्धि के लिए सामने देखता हुआ दृश्य को नहीं देखता, इस प्रश्न का उत्तर कहते हैं।
बोध से जिसका दृश्यभाव गलित हो गया है, ऐसे द्रष्टाकी सत्ता ही अवभासित होती है,
जैसे कि कटक के प्रति अनुसन्धान न करनेपर सुवर्ण की अकटकता ही भासित होती है