Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 74
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verse 74 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 74
संस्कृत श्लोक
दृश्ये सत्यस्ति वै द्रष्टा दृश्यं द्रष्टरि भासते ।
द्वयेन च विना नैकं नैकमप्यस्ति चानयोः ॥ ७४ ॥
हिन्दी अर्थ
दृश्य का दर्शन न होने पर भी द्रष्टा का दर्शन अपरिहार्य है, इसलिए आत्यन्तिक दृश्य का
अदर्शन कैसे सिद्ध होगा ? इस पर कहते हैं।
दृश्य के रहते द्रष्टा रहता है और दृश्य द्रष्टा के रहते भासित होता हे । दोनों के बिना एक
भी भासित नहीं होता, अतः इन द्रष्टा और दृश्य के बीच में एक भी नहीं है, जैसे कि छत्र के हट
जानेपर छाया हट जाती है, वैसे ही दृश्य के नष्ट होने पर द्रष्टा का भी अपाय हो जाता है,
इसलिए दुगूमात्र का परिशेष रहता है