Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 92
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verse 92 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 92
संस्कृत श्लोक
अहो नु भीमा मायेयमथवा मायिनां परा ।
परमाण्वन्तरेवास्ति यत्त्रैलोक्यपरम्परा ॥ ९२ ॥
हिन्दी अर्थ
यह जगत् बृहद्भ्रम है, इस अंश का उपपादन करते हैं।
यह आत्मचिति मायाशबल होने के कारण माया है अथवा मायावी यानी लोगों को मोह में
डालनेवाले लोगों की माया से भी श्रेष्ठ है, क्योंकि परमाणु के अन्दर ही तीनों लोकों की
परम्परा है, इसलिए दर्पण के अन्दर प्रतीत हुए पर्वत के समान वह है ही नहीं, अत: वह
बृहद्भ्रम ही है