Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 93
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verse 93 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 93
संस्कृत श्लोक
अथासंभवमायित्वमेवैतत्सर्वदा स्थितम् ।
चिन्मात्रपरमाणुत्वमात्रमेव जगत्स्थितिः ॥ ९३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि एक अद्वितीय ब्रह्म ही है“ इस श्रुति से माया की भी असत्ता प्रतिपादित है, तो जगत्
चिदणु ही है, कोड दूसरी वस्तु नहीं है, इसलिए जगत्प्रतीति महाभ्रम ही है, इस आशय से
कहते हैं।
यदि आत्मस्वरूप सदा मायाशून्य ही है, तो सर्वदा आत्मस्वरूप ही स्थित है, इस पक्ष में
भी जगत्स्थिति चिन्मात्रपरमाणुत्वमात्र ही है, उससे पृथक् नहीं है